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बांग्लादेशी लेखिका तस्लीमा नसरीन ने पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव परिणामों पर लंबा लेख लिखते हुए इसे केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि जनता के भीतर वर्षों से जमा गुस्से, निराशा और असंतोष का विस्फोट बताया है. उन्होंने कहा कि लोगों ने सिर्फ भाजपा को सत्ता में लाने के लिए वोट नहीं किया, बल्कि उससे भी ज्यादा तृणमूल कांग्रेस को हराने के लिए मतदान किया.
कभी बदलाव का प्रतीक थी टीएमसी- तस्लीमा नसरीन
तस्लीमा ने अपने लेख में आरोप लगाया कि जो पार्टी कभी बदलाव का प्रतीक थी, वही समय के साथ भ्रष्टाचार, सत्ता के अहंकार और पक्षपातपूर्ण राजनीति की पहचान बन गई. उन्होंने लिखा कि तृणमूल सरकार पर लंबे समय से मुस्लिम तुष्टिकरण, प्रशासन और पुलिस के राजनीतिक इस्तेमाल, शिक्षक भर्ती घोटाले, ‘कट मनी’ संस्कृति और स्थानीय नेताओं की अचानक बढ़ी संपत्ति जैसे आरोप लगते रहे हैं.
उन्होंने कहा कि राज्य में कल्याणकारी योजनाओं के बावजूद विपक्ष जनता के बीच यह धारणा बनाने में सफल रहा कि विकास की जगह “भत्तों के जरिए वोट खरीदे जा रहे हैं.” सरकारी कर्मचारियों में डीए आंदोलन, नौकरी को लेकर नाराजगी और प्रशासन से बढ़ती दूरी ने भी शिक्षित मध्यम वर्ग को तृणमूल से दूर कर दिया.
ममता राज में नहीं मिला कई मामलों में न्याय
लेखिका ने चुनावी हिंसा, बूथ कैप्चरिंग, विपक्षी कार्यकर्ताओं पर हमलों और महिलाओं की सुरक्षा को भी बड़ा मुद्दा बताया. उनके मुताबिक कई मामलों में न्याय न मिलने और सत्ता पक्ष की असंवेदनशील टिप्पणियों ने आम लोगों में गहरी नाराजगी पैदा की.
ममता बनर्जी को लेकर तस्लीमा ने लिखा कि लंबे समय तक सत्ता में रहने के कारण उनके आसपास व्यक्तिपूजा, अत्यधिक केंद्रीकरण और सत्ता के अहंकार का माहौल बन गया. विपक्ष जनता के बीच यह संदेश स्थापित करने में सफल रहा कि ‘बंगाल अब आपको नहीं चाहता.’
अपने लेख में तस्लीमा नसरीन ने बंगाल की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत का भी जिक्र किया. उन्होंने कहा कि बंगाल सिर्फ एक भूभाग नहीं, बल्कि पुनर्जागरण, स्वतंत्र चिंतन और मानवतावाद की धरती रहा है. उन्होंने राजा राममोहन रॉय, स्वामी विवेकानंद, रबींद्रनाथ टैगोर, सुभाष चंद्र बोस और काजी नजरुल इस्लाम जैसे विचारकों का उल्लेख करते हुए कहा कि यही बंगाल कभी स्वतंत्र सोच और विरोध की आवाज रहा है.
कमजोर पड़ी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता
उन्होंने आरोप लगाया कि आज बंगाल का बड़ा सांस्कृतिक और बौद्धिक वर्ग सत्ता के करीब दिखाई देता है. लेखिका के मुताबिक कलाकार, लेखक और बुद्धिजीवी अब स्वतंत्र आवाज के बजाय सत्ता समर्थक छवि में देखे जाते हैं. उन्होंने कहा कि जब कला और साहित्य सत्ता तथा सुविधाओं के आगे झुक जाते हैं, तब अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कमजोर पड़ जाती है.
तस्लीमा नसरीन ने अपने निजी अनुभवों का भी जिक्र किया. उन्होंने कहा कि पहले कम्यूनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सिस्ट) सरकार ने उनकी किताब पर प्रतिबंध लगाया और बाद में तृणमूल सरकार ने भी उन्हें बंगाल लौटने की अनुमति नहीं दी. उन्होंने इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला बताया. उन्होंने कहा कि सिर्फ सरकार बदलने से समाज नहीं बदलता. समाज तब बदलता है जब लेखक, पत्रकार, शिक्षक और कलाकार सत्ता से डरना छोड़ दें और सच बोलने का साहस बनाए रखें. उनके मुताबिक बंगाल के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या वह अपनी उदार, मानवतावादी और तार्किक परंपराओं की ओर लौटेगा या फिर नफरत और ध्रुवीकरण की राजनीति में और आगे बढ़ेगा.
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